परिचय.
कम्प्यूटर एक ऐसा यंत्र है जो दषकों की यात्रा सम्पन्न कर आज अपने इस रूप में उपलब्ध है जिसकी तुलना मानवीय षरीर की रचना से होती है तथा यह कहना भी अतिष्योक्ति न होगा कि इसका विकास मानव संसाधन के विकल्प के रूप में ही हुआ। इस अध्याय में कम्प्यूटर की परिभाषा, कम्प्यूटर का इतिहास, कम्प्यूटर की विषेशताएॅं एवं कमियॉ, कम्प्यूटर के विभिन्न प्रकार तथा पर्सनल कम्प्यूटर पर आधारित सूचना प्रस्तुत है।
कम्प्यूटर का इतिहास लगभग 3000 वर्ष पुराना है। जबकि चीन में एक गणना-यंत्र अबेकस का आविश्कार हुआ था। यह एक यंात्रिक डिवाइस है। जो आज भी चीन ,जापान सहित एषिया के अनेक देषो में अंको की गणना के लिये काम आती है।
अबेकस तारों का एक फ्रेम होता है। इन तारों में बीड (पक्की मिट्टी के गोल टुकडें जिनमें छेद हों) पिराए रहते हैं। प्रारम्भ में अबेकस को व्यापारी गणनाएॅं करने के काम में प्रयोग किया करते थे। यह मषीन अंको के जोड़, घटाव, गुणा व भाग क्रियाएॅ करने के काम आती है।
षताब्दियों बाद अनेक अन्य यांत्रिक मषीनें अंकों की गणना के लिए विकसित की गई। सत्रहवीं षताब्दी में फ्रांस के गणितज्ञ ब्लेज पास्कल ने एक यांत्रिक अंकीय गणना-यंत्र सन् 1645 में विकसित किया। इस मषीन को एडिंग मषीन कहते थे, क्योंकि यह केवल जोड़ या घटाव कर सकती थी। यह मषीन घड़ी और ओडोमीटर के सिद्धांत पर कार्य करती थी। उसमें कई दॉतेयुक्त चकरियॉ थीं जो घूमती रहती थीं। चकरियों के दॉतों पर 0 से 9 तक के अंक छपे रहते थें। प्रत्येक चकरी का एक स्थानीय मान था। जैसे- इकाई, दहाई, सैकड़ा आदि।
इसमें प्रत्येक चकरी स्वयं से पिछली चकरी के एक चक्कर लगाने पर एक अंक पर घुमती थी। ब्लेज पास्कल के इस एडिंग मषीन को पास्कलाइन कहते हैं जो सबसे पहला यांत्रिकीय गणना-यंत्र था। आज भी कार व स्कूटर के स्पीडोमीटर में यही यंत्र कार्य करता हैं।
सन् 1694 में जर्मन गणितज्ञ व दार्षनिक गॉटफ्रेड विलहेम वॉन लेबनीज (1646-1716) ने पास्कलाइन का विकसित रूप तैयार किया जिसे ‘रेक्निंग मषीन या लेबनीज चक्र कहते हैं। यह मषीन अंको के जोड़ व बाकी के अलावा गुणा व भाग की क्रिया भी करती थी। इसके पष्चात, इसी प्रकार का एक यांत्रिक गणना-यंत्र एरिथ्मोमीटर थॉमस डे कॉल्मर ने 1820 में बनाया था।
पी.सी. में इनपुट यूनिट के रूप में प्रायः की-बोर्ड और माउस काम आते हैं जबकि आउटपुट यूनिट के रूप में मॉनीटर और प्रिंटर काम आते हैं।
पी.सी. के सिस्टम यूनिट में निम्नलिखित डिवाइसेज होती हैं:
मदरबोर्ड
मेमोरीविद्युत सप्लाई के लिए एस.एम.पी.एस.
अन्य परिपथ कार्ड
हार्डडिस्क ड्राइव
फलॉपी डिस्क ड्राइव
कॉम्पैक्ट डिस्क ड्राइव
नेटवर्क कार्ड
मदरबोर्ड यह एक प्रिन्टेड सर्किट बोर्ड है जो कि अधिकांष इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज द्वारा र्नििर्मत होता है। इस पर लगभग 100 माइक्रोप्रोसेसर चिप होते हैं। यह एक मध्य प्रक्रिया प्रभाग है, जिसे कम्प्यूटर का हृदय भी कहा जा सकता है। इसका मुख्य कार्य प्रोग्राम का क्रियान्वयन व दिये हुए डाटा, निर्देष आदि को RAM में स्टोर करना होता है। कम्प्यूटर के अन्य पाटर््स भी एक-दूसरे से मदरबोर्ड के द्वारा ही जुडे़ होते हैं।
इसकी कार्यक्षमता निम्नलिखित खण्डों पर निर्भर करती है:
सी.पी.यू. के द्वारा की जाने वाली सभी प्रकिया माइक्रोप्रोसर की गति पर निर्भर होती है। बाजार में 2 जीगाहर्ज़ तक घड़ी की गति के प्रोसेसर उपलब्ध हैं।
सी.पी. यू. से मैमोरी व मैमोरी से सी.पी.यू. तक डाटा व निर्देषों को लाने ले जाने का कार्य डाटा बस द्वारा किया जाता हैै। यह कार्य किस गति से हो रहा है, यह डाटा बस की चौड़ाई पर निर्भर करता है। डाटा बस की चौड़ाई किसी लिखे गये षब्द के आकार व उसकी बिट्स पर निर्भर करता है। षब्द का आकार मुख्यतः 8, 16, 32, 64, या 128 बिट्स का होता है।
बिट्स की लम्बाई माइक्रोप्रोसेसर द्वारा उपलब्ध कराये गये ऐड्रेस व मेमोरी में उपलब्ध लोकेषन पर निर्भर करती है।
मेमोरी पी.सी. में मेमोरी या स्मृति एक महम्वपूर्ण डिवाइस है। यह चिप पर होती है जो इनपुट किये गये डाटा, निर्देष और प्रोग्राम्स को 1 और 0 की डिजिटल अवस्था में संगृहीत करके रखती है। इनपुट यूनिट से डाटा और निर्देष इनपुट होने के बाद मेमोरी में जाते हैं। सी.पी.यू. समय-समय पर प्रोसेसिंग के दौरान डाटा और निर्देषों को मेमोरी से लेता रहता है। प्रोसेसिंग के बाद भी परिणाम मेमोरी के जरिये आउटपुट यूनिट की ओर सी.पी.यू. द्वारा भेजे जाते हैं। पी.सी. की मेमोरी की एक सीमा होती है। मेमोरी की संग्रह क्षमता प्रायः मेगाबाइट या एम.बी. में व्यक्त की जाती है। मेगा का अर्थ है 106 और एक बाइट का अर्थ आठ बिट्स होता है। 1 या 0 को बिट कहते हैं। आजकल पी.सी. की मेमोरी 128 MB तथा अधिक तक में उपलब्ध है। मेमोरी को प्राथमिक संग्रहण भी कहते हैं।
हार्ड डिस्क ड्राइव यह डाटा और प्रोग्राम को बाद में उपयोग हेतु संग्रह करने के लिए एक द्वितीयक संग्रहण माध्यम है। पी.सी. में हार्ड डिस्क की संग्रह-क्षमता निष्चित होती है। आज हार्ड डिस्क, 400 GB तक की क्षमता में बाजार में उपलब्ध हैं। यह पी.सी. को संचालित करने के लिए सॉफ्टवेयर प्रोग्राम्स, जैसे- ऑपरेटिंग सिस्टमए एप्लीकेषन प्रोग्राम आदि संगृहीत करके रखती है। सी.पी.यू. हार्ड डिस्क से प्रोग्राम्स को मेमोरी में पहॅुचाकर उन्हें क्रियान्वित करता है।
फ्लॉपी डिस्क ड्राइव यह कम क्षमता की द्वितीयक स्टोरेज माध्यम फ्लॉपी डिस्क को संचालित करती है। फ्लॉपी डिस्क को सिस्टम यूनिट से बाहर निकाला जा सकता है और अन्यत्र लाया तथा ले जाया जा सकता है। फलॉपी डिस्क प्रायः दो प्रकार की होती हैं जिनकी क्षमता 1.2 MB और अधिक होती है। और 1.44 MB होती है। जीप फ्लॉपी ड्राइव की स्टोरेज क्षमता अधिक होती है। यह बडे़ फाइल साइज जैसे- ग्राफिकल ड्राइंग, त्रिविमीय ड्राइंग को संगृहीत करने के काम में आती है। यह 1.44 MB की फ्लॉपी से लगभग दस गुना ज्यादा क्षमता वाली तथा महंगी होती है।
काम्पैक्ट डिस्क ड्राइव यह एक विषेश डिस्क सी.डी को संचालित करने के लिए डिवाइस होती है। सी.डी. में फ्लॉपी डिस्क से अधिक मात्रा मे डाटा और प्रोग्राम्स संग्रहित किये जा सकते है, इस डिवाइस में लेसर बीम तकनीक से डाटा को पढ़ा जा सकता है। सी.डी. की संग्रह-क्षमता 650 MB या इससे अधिक होती है।
एस. एम. पी. एस यह ए.सी. विद्युत-धारा को सिस्टम यूनिट कें विभिन्न डिवाइसों और मेन बोर्ड के लिये बॉटने का कार्य करता है। यह ए.सी. विद्युत-धारा को डी.सी. विद्युत-धारा में परिणत भी करता है। एस. एम. पी. एस. मॉनीटर, प्रिंटर आदि को भी विद्युत वितरित करता है।
मॉडेम मॉडेम, मॉड्यूलेटर-डिमॉड्यूलेटर का उपनाम है। यह एक ऐसी डिवाइस हैं जो पी. सी. और टेलीफोन लाइन के मध्य लगायी जाती है। कम्प्यूटर में डाटा व प्रोग्राम्स 1 तथा 0 की डिजिटल अवस्था में रहते हैं जबकि टेलीफोन लाइन पर डाटा तरंग अवस्था में संचरित होता है। मॉडेम कम्प्यूटर से प्राप्त डिजिटल संकेतों को विद्युत संकेतों में बदल देता है जिससे ये टेलीफोन लाइन में संचरित हो सकें। इस क्रिया को मॉड्यूलेषन कहते हैं। जब टेलीफोन लाइन से प्राप्त तरंग संकेतों को यह डिजिटल संकेतों में परिवर्तित करता है तो यह क्रिया डिमॉड्यूलेषन कहलाती है। यह डिवाइस मॉड्यूलेषन और डिमॉड्यूलेषन, दोनों क्रियाएॅ करने में सक्षम है। इसलिए इसका नाम मॉडेम रखा गया।
पर्सनल कम्प्यूटर के बाह्य भाग पर्सनल कम्प्यूटर के आंतरिक भाग जो सिस्टम यूनिट के भाग हैं, के अतिरिक्त कुछ महत्वपूर्ण बाह्य भाग हैं जो निम्नलिखित हैं-
की-बोर्ड और माउस- ये दोनों ही इनपुट डिवाइसेज हैं जो डाटा और निर्देषों को पी.सी. में प्रवेष कराते हैं। की-बोर्ड के माध्यम से डाटा को इलेक्ट्रॉनिक अवस्था में परिवर्तित करके सिस्टम यूनिट की ओर भेजा जाता है। माउस की सहायता से स्क्रीन पर आइकन तथा मैन्यू जो निर्देषों के ग्राफिकल रूप होते हैं, का चयन कर उसे क्रियान्वित करते हैं।
मॉनीटर- मॉनीटर को स्क्रीन भी कहते हैं। यह एक आउटपुट डिवाइस है क्योंकि यह सिस्टम यूनिट से प्राप्त परिणाम या आउटपुट को दिखाता है।
प्रिंटर- सिस्टम यूनिट से प्राप्त आउटपुट को कागज पर छापने का कार्य करने वाला डिवाइस प्रिंटर कहलाता है।
स्पीकर - सिस्टम यूनिट से प्राप्त ध्वनि, संगीत आदि को सुनाने के लिये स्पीकर होते हैं।
कम्प्यूटर की विषेशताएॅं आजकल कम्प्यूटर प्रणाली का उपयोग हर क्षेत्र में हो रहा है, इसका कारण इसकी निम्नलिखित विषेशताएॅ हैंः-
1) गतिः-कम्प्यूटर किसी भी कार्य को बहुत तेजी से कर सकता हैै। कम्प्यूटर कुछ ही क्षण में जोड़/घटाव की करोड़ों क्रियाएॅ कर सकता है। यदि आपको 440 ग 56 का गुणा करना हो तो इसमें लगभग 1 से लेकर 2 मिनट तक का आपको समय लग सकता है यही कार्य पॉकेट कैलकुलेटर से करे तो वह लगभग 5 सेकेंड में किया जा सकता हे लेकिन एक आधुनिक कम्प्यूटर में यदि प्रोग्राम दिया गया हो तो ऐसे 30 लाख ऑपरेषन एक साथ कुछ सेकण्ड मे सम्पन्न हो सकते हैं।
2) स्वचालन:-कम्प्यूटर अपना कार्य, प्रोग्राम (निर्देषांे का एक समूह) के एक बार लोड हो जाने पर स्वतः करता रहता है। उदाहरणार्थ, किसी डाटा एन्ट्री प्रोग्राम पर कार्य कर रहे आपरेटर को स्वयं रिपोर्ट तैयार करने की आवष्यकता नहीं, अपितु कम्प्यूटर स्वयं प्रविश्ट डाटा के आधार पर रिपोर्ट जनित करता रहता हैं।
3) षुद्धताः-कम्प्यूटर अपना कार्य बिना किसी गलती के करता है। कम्प्यूटर द्वारा गलती किये जाने के कई उदाहरण सामने आते है लेकिन इन सभी गलतियों में या तो गलती कम्प्यूटर में डाटा प्रविश्ट करते समय की गई होती है या प्रोग्राम के विकास के समय, कम्प्यूटर स्वयं कभी गलती नहीं करता हैं।
4) सार्वभौमिकताः-कम्प्यूटर अपनी सार्वभौमिमता के गुण के कारण बड़ी तेजी से सारी दुनिया में छाता जा रहा है। कम्प्यूटर गणितीय कार्यो को सम्पन्न करने के साथ-साथ व्यवसायिक कार्यो के लिए भी प्रयोग में लाया जाने लगा है। कम्प्यूटर में प्रिंटर संयोजित करके सभी प्रकार की सूचनायें कई रूपों में प्रस्तुत की जा सकती हैं। कम्प्यूटर को टेलीफोन या टेलीफोन लाइन से जोड़कर सारी दुनिया में सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जा सकता है। कम्प्यूटर की सहायता से तरह-तरह के खेल खेले जा सकते है।
5) उच्च संग्रहण क्षमता:-एक कम्प्यूटर सिस्टम की डाटा संग्रहण क्षमता अत्यधिक होती है। कम्प्यूटर लाखों षब्दों को बहुत कम जगह में संगृहीत करके रख सकता हैं। यह सभी प्रकार के डाटा, चित्र, प्रोग्राम, क्रीडा ताथा आवाज को कई वर्शो तक संगृहीत करके रख सकता है। कभी भी यह सूचना कुछ ही सेकेण्ड मंे प्राप्त कर सकते है तथा अपने उपयोग में ला सकते हैं।
6) कर्मठता:-मानव किसी कार्य को निरन्तर कुछ ही घण्टों तक करते हुए थक जाता हैं। इसके ठीक विपरीत, कम्प्यूटर किसी कार्य को निरन्तर कई घण्टों, दिनों तथा महिनों तक करने की क्षमता रखता है। इसके बावजूद उसके कार्य करने की क्षमता में न ही कोई कमी आती है और न ही कार्य के परिणाम की षुद्धता घटती हैं। कम्प्यूटर किसी भी दिये गये कार्य को बगैर किसी भेद-भाव के करता है चाहे कार्य रूचिकर हो या उबाउ।
कम्प्यूटर की सीमाएॅ कम्प्यूटर ने निस्संदेह मानव जीवन को सहज बनाने में अभूतपूर्व योगदान दिया हैं। आज तक के सभी आविश्कारों पर कम्प्यूटर के अविश्कार ने एक महत्वपूर्ण छाप छोड़ी हैं। कम्प्यूटर की विषेशताएॅ ही मूलतः आज इसके लोकप्रियता का कारण हैं। किन्तु किसी भी मानव-निर्मित प्रणाली की सीमाएॅ या कमियॉ हो सकती है। इसके बगैर किसी प्रणाली की कल्पना षायद नहीं की जा सकती है। अतः कम्प्यूटर की कमियॉ का भी जानना आवष्यक है। इसकी कमियॉ इस प्रकार है
1) बुद्धिमता की कमीः-कम्प्यूटर मषीन है। इसका कार्य प्रयोक्ता के निर्देषों को कार्यन्वित करना हैं। कम्प्यूटर किसी भी स्थिति में न ही निर्देष से अधिक और न ही इससे कम का क्रियान्वयन करता है। यद्यपि कम्प्यूटर वैज्ञानिक आज के कम्प्यूटर में कृत्रिम बुद्धिमता के बारें में षोध कर रहे हैं, इसके सफलता मिलने पर कम्प्यूटर के अंदर बुद्धिमता की कमी तो कुछ हउ तक दूर हो सकेगी परन्तु मानवीय बुद्धिमता की तुलना कभी भी एक मषीनी बुद्धिमता के साथ नहीं हो पाएगी।
2) सामान्य बोध की कमी:-कम्प्यूटर एक बिल्कुल मूर्ख नौकर की भॉति कार्य करता है। इसे यदि कहें कि जाओं और बाजार से सब्जी खरीद लाओ। ऐसा निर्देष देने पर वह बाजार जायेगा और सब्जी भी खरीदेंगा परन्तु सब्जी घर तक लेकर कभी नहीं लौटेगा। पूछेंगे क्यों ? इसका सीधा उत्तर है कि आपने उससे सब्जी खरीदने को अवष्य कहा परन्तु लाने को नहीं कहा। इसका अर्थ यह है कि कम्प्यूटर के अंदर सामान्य बोध नहीं होता है।
3) आत्मरक्षा करने में अक्षमः- कम्प्यूटर चाहे जितना भी षक्तिषाली क्यों न हो परन्तु उसका नियंत्रण मानव के पास ही होता है तथा वह जिस प्रकार उसे नियंत्रित करता है नियंत्रित होता हैं। कम्प्यूटर किसी भी प्रकार आत्मरक्षा नहीं कर सकता है। उदाहरणार्थ रवि नामक किसी व्यक्ति ने एक ई-मेल अकाउन्ट बनाया तथा एक विषेश पासवर्ड उसने अपने इस अकाउन्ट को खोलने के लिए चूना। कम्प्यूटर अब यह नहीं देखता कि उस अकाउन्ट को खोलने वाला रवि ही है बल्कि यह देखता है कि पासवर्ड क्या हैं ? ठीक उसी प्रकार स्वचालित टेलर-मषीन से पैसा कौन निकाल रहा है इसकी चिंता कम्प्यूटर नहीं करता, बल्कि यह केवल कार्ड के साथ पासवर्ड वैध है कि नहीं, इसकी जॉच करता है। यह दृश्टिकोण कम्प्यूटर को एक ओर अविष्वसनीय बनाता है तो दूसरी ओर इसकी विष्वसनीयता पर एक प्रष्नचिन्ह भी खड़ा करता हैं।
कम्प्यूटरों के प्रकार . कम्प्यूटर अपने काम-काज, प्रयोजन या उद्देष्य तथा आकार-षक्ति के आधार पर विभिन्न प्रकार के होते हैं। वस्तुतः इनका सीधे-सीधे अर्थात् प्रत्यक्षतः वर्गीकरण करना कठिन है, इसलिए इन्हें निम्नलिखित तीन आधारों पर वर्गीकृत करते हैं-
अनुप्रयोग के आधार पर कम्प्यूटरों के प्रकार.
यद्यपि कम्प्यूटर के अनेक अनुप्रयोग हैं जिनमें से तीन अनुप्रयोगों के तीन प्रकार होते हैंः-
एनालॉग कम्प्यूटर- एनालॉग कम्प्यूटर वे कम्प्यूटर होते हैं जो भौतिक मात्राओं, जैसे-दाब, तापमान, लम्बाई आदि को मापकर उनके परिमाप अंकों में व्यक्त करते हैं। ये कम्प्यूटर किसी राषि का परिमाप, तुलना के आधार पर करते हैं। जैसे कि एक थर्मामीटर कोई गणना नहीं करता है अपितु ये पारे के सम्बंधित प्रसार की तुलना करके षरीर के तापमान को मापता है। एनालॉग कम्प्यूटर मुख्य रूप से विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में प्रयोग किये जाते हैं क्योंकि इन क्षेत्रों में मात्राओं का अधिक उपयोग होता है। ये कम्प्यूटर केवल अनुमानित परिमाप ही देते हैं।
डिजिटल कम्प्यूटर - डिजिटल कम्प्यूटर वह कम्प्यूटर होता है जो अंकों की गणना करता है। डिजिटल कम्प्यूटर डाटा और प्रोग्रम्स को 0 और 1 में परिवर्तित करके उनको इलेक्ट्रॉनिक रूप में ले आता है। अधिकतर कम्प्यूटर डिजिटल कम्प्यूटर की श्रेणी में आते है।
हायब्रिड कम्प्यूटर . हायब्रिड का अर्थ है। संकरित अर्थात् अनेक गुण -धर्म में युक्त होना। वे कम्प्यूटर जिनमें एनालॉग कम्प्यूटर और डिजिटल कम्प्यूटर, दोनों के गुण उपस्थित हों, हायब्रिड कम्प्यूटर कहलाते हैं।
उद्देष्य के आधार पर कम्प्यूटरों के प्रकार .
कम्प्यूटर को दो उद्देष्यों के लिए हम स्थापित कर सकते हैं- सामान्य और विषिश्ट। इस प्रकार कम्प्यूटर, उद्देष्य के आधार पर निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं:
- सामान्य-उद्देषीय कम्प्यूटर
- विषिश्ट-उद्देषीय कम्प्यूटर
विषिश्ट-उद्देषीय कम्प्यूटर - ये ऐसे कम्प्यूटर हैं जिन्हें किसी विषेश कार्य के लिए तैयार किया जाता है। इनके सी. पी. यू. की क्षमता उस कार्य के अनुरूप होती है जिसके लिए इन्हें तैयार किया गया है।
उदाहरणार्थ, संगीत-संपादन करने हेतु किसी सटूडियो में लगाया जाने वाला कम्प्यूटर विषिश्ट उद्देषीय कम्प्यूटर हागा। इसके अलावा विषिश्ट उद्देषीय कम्प्यूटर निम्नलिखित क्षेत्रों में भी उपयोगी हैं:
- अन्तरिक्ष-विज्ञान एवं खगोलषास्त्र
- युद्ध में प्रक्षेपास्त्रों का नियन्त्रण
- भौतिक व रसायन विज्ञान में षोध
- यातायात-नियन्त्रण
- कृशि विज्ञान फिल्म-उद्योग में फिल्म-संपादन
- मौसम विज्ञान
- उपग्रह-संचालन
- चिकित्सा
- समुद्र-विज्ञान
- इंजीनियरिंग
आकार के आधार पर कम्प्यूटरों की पॉच श्रेणियॉ होती हैं
माइक्रो कम्प्यूटर- तकनीक के क्षेत्र में सन् 1970 में एक क्रांतिकारी आविश्कार हुआ। यह आविश्कार था माइक्रोप्रोसेसर का जिसके उपयोग से सस्ती कम्प्यूटर-प्रणाली बनाना सम्भव हुआ। ये कम्प्यूटर एक डेस्क पर अथवा एक ब्रीफकेस में भी रखे जा सकते हैं। ये छोटे कम्प्यूटर माइक्रो कम्प्यूटर कहलाते हैं। माइक्रो कम्प्यूटर कीमत में सस्ते और आकार कम्प्यूटर या पी. सी. भी कहा जाता हें माइक्रो कम्प्यूटर में एक ही सी. पी. यू. लगा होता है। वर्तमान समय में माइक्रो कम्प्यूटर का विकास तेजी से हो रहा है। परिणामस्वरूप यह एक पुस्तक के आकार, फोन के आकार और यहॉ तक कि घड़ी के आकार में भी आ रहा है। माइक्रो कॅप्यूटर 20-25 हजार रूपये से 1 लाख रूपये तक की कीमत में उपलब्ध हैं।
वर्कस्टेषन- वर्कस्टेषन आकार में माइक्रो कम्प्यूटर के समान होने के बावजूद अधिक षक्तिषाली होते हैं तथा इन्हें विषश रूप से जटिल कार्यों के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। इस प्रकार के कम्प्यूटर माइक्रो कम्प्यूटर के प्रायः लक्षणों को अपने अन्दर रखते हैं तथा माइक्रो कम्प्यूटर के समान ही एक समय में एक ही प्रयोक्ता के द्वारा संचालित किए जाते हैं। इनके कार्यक्षमता मिनी कम्प्यूटरों के समान होता है। इनका प्रयोग मूलतः वैज्ञानिकों, अभियंताओं तथा दूसरे व्यवसायिकों के द्वारा होता है। ये माइक्रो कम्प्यूटर की अपेक्षा महॅगे होते हैं। किन्तु माइक्रो कम्प्यूटर में अपार बदलाव तथा इसके वृहद स्तर के विकार के बाद अब वर्कस्टेषन का प्रचलन कम हुआ है तथा माइक्रो कम्प्यूटर के उन्नत उत्पाद ने इसका स्थान लेना प्रारम्भ कर दिया है। अब माइक्रो कम्प्यूटर भी उन्नत ग्राफिक्स तथा संचार क्षमताओं के साथ बाजार में उपलब्ध हो रहे हैं।
मिनी कम्प्यूटर. ये कम्प्यूटर मध्यम आकार के कम्प्यूटर होते हैं। ये माइक्रो कम्प्यूटर की अपेक्षा अधिक कार्यक्षमता वाले होते हैं। मिनी कम्प्यूटरों की कीमत माइक्रो कम्प्यूटरों से अधिक होती है और ये व्यक्तिगत रूप से नहीं खरीदे जा सकते हैं। इन्हें छोटी या मध्यम स्तर की कम्पनियॉ काम में लाती हैं। इस कम्प्यूटर पर एक से अधिक व्यक्ति कार्य कर सकते हैं। मिनी कम्प्यूटर में एक से अधिक सी. पी. यू. होते हैं। इनकी मेमोरी और गति माइक्रो कम्प्यूटर से अधिक और मेनफ्रेम कम्प्यूटर से कम होती है। ये मेनफ्रेम कम्प्यूटर से सस्ते होते हैं। मध्यम स्तर की कम्पनियों में मिनी कम्प्यूटर ही उपयोगी माने जाते हैं। यद्यपि अनेक व्यक्तियों के लिए अलग-अलग माइक्रो कम्प्यूटर लगाना भी सम्भव है, परन्तु यह महॅगा पड़ता है। प्रति व्यक्ति माइक्रो कम्प्यूटर की अपेक्षा मिनी कम्पयूटर कम्पनी में केन्द्रीय कम्प्यूटर के रूप में कार्य करता है और इससे कम्प्यूटर के संसाधनों का साझा हो जाता है। इसके अलावा अनेक माइक्रो कम्प्यूटर होने पर उनके रख-रखाव व मरम्मत की समस्या बढ़ जाती है।
एक मध्यम स्तर की कम्पनी मिनी कम्प्यूटर का उपयोग निम्नलिखित कार्यों के लिए कर सकती है:
कर्मचारियों के वेतन की गणना और वेतनपत्र तैयार करना
वित्तीय खातों का रख-रखाव
लागत-विष्लेशण
उत्पादन-योजना
मिनी कम्प्यूटरों के अन्य उपयोग, यातायात में यात्रियों के लिए आरक्षण-प्रणाली का संचालन और बैंकों में बैंकिंग के कार्य हैं। सबसे पहला मिनी कम्प्यूटर PDP – 8 एक रेफ्रिजरेटर के आकार का, 18000 डॉलर कीमत का था जिसे डी. ई. सी. ने सन् 1965 में तैयार किया था।
मेनफ्रेम कम्प्यूटर ये कम्प्यूटर आकार में बहुत बडे़ होते हैं साथ ही इनकी संग्रहण-क्षमता भी अधिक होती है। इनमें अधिक मात्रा के डाटा पर तीव्रता से प्रोसेस या क्रिया करने की क्षमता होती है, इसलिए इनका उपयोग बड़ी कम्पनियॉं, बैंक तथा सरकारी विभाग एक केन्द्रीय कम्प्यूटर के रूप में करते हैं। ये चौबीसों घंटे कार्य कर सकते हैं। मेनफ्रेम कम्प्यूटर को एक नेटवर्क या माइक्रो कम्प्यूटरों से परस्पर जोड़ा जा सकता है। अधिकतर कम्पनियॉ या संस्थाएॅं मेनफ्रेम कम्प्यूटर का उपयोग निम्नलिखित कार्यों के लिए करती हैं: (i) उपभोक्ताओं द्वारा खरीद का ब्यौरा रखना, (ii) भुगतानों का ब्यौरा रखना, (iii) बिलों को भेजना, रखना, (iv) नोटिस भेजना, (v) कर्मचारियों को भुगतान करना, (vi) कर का विस्तृत ब्यौरा रखना आदि। मेनफ्रेम कम्प्यूटरांे के उदाहरण हैं - IBM 4381,ICL39 श्रृंखला और CDC Cyber श्रृंखला।
सुपर कम्प्यूटर सुपर कम्प्यूटर, कम्प्यूटर की सभी श्रेणियों में सबसे बडे़ आकार व सबसे अधिक संग्रहण-क्षमता वाले तथा सबसे अधिक कार्यकारी गति वाले होते हैं। इनमंे अनेक सी. पी. यू. समानान्तर क्रम में कार्य करते हैं। इस क्रिया को समानान्तर प्रक्रिया कहते हैं। सुपर कम्प्यूटर का उपयोग निम्नलिखित कार्यों में होता है:
बड़ी वैज्ञानिक और षाध प्रयोगषालाओं में षोध व खोज करना।
अंतरिक्ष-यात्रा के लिये अन्तरिक्ष-यात्रियों को अन्तरिक्ष में भेजना।
मौसम की भविश्यवाणी और मौसम सम्बन्धी ऑकड़ा संग्रहण ।
उच्च गुणवत्ता की एनीमेषन वाले चलचित्र का निर्माण।
सुपर कम्प्यूटर सबसे महॅगे कम्प्यूटर होते हैं। इनकी कीमत अरबों रूपयों में होती है। भारत के पास भी सुपर कम्प्यूटर है जिसका नाम है - परम। इसे भारतीय कम्प्यूटर वैज्ञानिकों ने ही भारतवर्श में तैयार किया है। सुपर कम्प्यूटर के अन्य उदाहरण हैं- CRAY-2, CRAY XMP-24 और NEC-500
कम्प्यूटर की पीढ़ियॉ
सन् 1946 में प्रथम इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, वैक्यूम टयूबयुक्त एनिएक कम्प्यूटर की षुरूआत ने कम्प्यूटर के विकास को एक आधार प्रदान किया। कम्प्यूटर के विकास के इस क्रम में कई महतवपूर्ण डिवाइसेज की सहायता से कम्प्यूटर ने आज तक की यात्रा तय की। इस विकास के क्रम को कम्प्यूटर में हुए मुख्य परिवर्तन के आधार पर पॉच पीढ़ियों में बॉटतें हैं।
प्रथम पीढ़ी . 1946 . 1956
द्वितीय पीढ़ीद्ध 1956 . 1964
तृतीय पीढ़ी . 1964 . 1971
चतुर्थ पीढ़ी . 1971 से वर्तमान
पंचम पीढ़ी . वर्तमान और भविश्य
कम्प्यूटरों की प्रथम पीढ़ी सन् 1946 मेें एनिएक (ENIAC) नामक कम्प्यूटर के निर्माण से ही कम्प्यूटर की प्रथम पीढ़ी का प्रारम्भ हो गया। इस पीढ़ी के कम्प्यूटरों में वैक्यूम टयूब का प्रयोग किया जाता था जिसका अविश्कार सन् 1904 में किया गया। इस पीढ़ी में एनिएक के अलावा और कई अन्य कम्प्यूटरों का निर्माण हुआ जिनके नाम-एडसैक (EDSAC – Electonic Delay Storage Automatic
Calculator), ,MoSd
(EDVAC
– Electronic Discrete Variable Automatic Computer), यूनिवैक (UNIVAC – Universal Automatic Computer) एवं यूनिवैक-1 (UNIVAC – 1) हैं।
प्रथम पीढ़ी के कम्प्यूटरों के लक्षण निम्नलिखित थे-
वैक्यूम टयूब का प्रयोग
पंचकार्ड पर आधारित
संग्रहण के लिए मैग्नेटिक ड्रम का प्रयोग
बहुत ही नाजुक और कम विष्वसनीय
बहुत सारे एयर कंडीषनरों का इस्तेमाल
मषीनी तथा असेम्बली भाशाओं में प्रोग्रामिंग
कम्प्यूटरों की द्वितीय पीढ़ी कम्प्यूटरों के द्वितीय पीढी की षुरूआत ट्रॉजिस्टर का कम्प्यूटर में उपयोग किया जाने से हुआ। विलियम षॉकले ने ट्रॉजिस्टर का आविश्कार 1947 में किया था जिसका उपयोग द्वितीय पीढी के कम्प्यूटरों में वैक्यूम टयूब के स्थान पर किया जाने लगा। ट्रॉजिस्टर के उपयोग ने कम्प्यूटरों को वैक्यूम टयूबों के अपेक्षाकृत अधिक गति एवं विष्वसनीयता प्रदान की।
द्वितीय पीढी के कम्प्यूटरों के मुख्य लक्षण निम्नलिखित थे-
वैक्यूम टयूब के बदले ट्रॉजिस्टर का उपयोग
अपेक्षाकृत छोटा एवं उर्जा की कम खपत
अधिक तेज एवं विष्वसनीय
प्रथम पीढ़ी की अपेक्षा कम खर्चीले
COBOL एवं FORTRAN जैसे उच्च्स्तरीय प्रोग्रामिंग भाशाओं का विकास
संग्रहण डिवाइस, प्रिंटर एंव ऑपरेटिंग सिस्टम आदि का प्रयोग
कम्प्यूटरों की तृतीय पीढ़ी कम्प्यूटरों की तृतीय पीढ़ी की षुरूआत 1964 में हुई। इस पीढी ने कम्प्यूटर को आई. सी. प्रदान किया। आई. सी. अर्थात एकीकृत सर्किट का आविश्कार टेक्सास इन्स्टूमेंन्ट कम्पनी के एक अभियंता जैक किल्बी ने किया था। इस पीढी के कम्प्यूटरों ICL2903,ICL 1900,UNIVAC 1108 और System 1360 प्रमुख थे।
तृतीय पीढ़ी के कम्प्यूटरों में मुख्य लक्षण थे-
- एकीकृत सर्किट का प्रयोग
- प्रथम एवं द्वितीय पीढ़ियों की अपेक्षा आकार एवं वजन बहुत कम
- अधिक विष्वसनीय
- पोर्टेबल एवं आसान रख-रखाव
- उच्चस्तरीय भाशाओं का वृहद स्तर पर प्रयोग
ALTAIR 8800 सबसे पहला माइक्रो कम्प्यूटर था जिसे मिट्स नामक कम्पनी ने बनाया था और इसी कम्प्यूटर पर बिल गेटस जो उस समय हावर्ड विष्वविद्यालय के छात्र थे, ने बेसिक भाशा को स्थापित किया था। इस सफल प्रयास के बाद बिल गेटस ने माइक्रोसॉप्ट कम्पनी की स्थापना की जो दुनिया मंें सॉप्टवेयर की सबसे बडी कम्पनी हैं। इस कारण बिल गेट्स को दुनिया भर के कम्प्यूटरों का स्वामी कहा जाता है।
इस पीढ़ी के कम्प्यूटरों में मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं-
- अतिविषाल स्तरीय एकीकरण तकनीक का उपयोग
- आकार में अद्भुत कमी
- साधारण आदमी के क्रय क्षमता के अंदर
- अधिक प्रभावषाली, विष्वसनीय एवं अद्भुत गतिमान
- अधिक मेमोरी क्षमता
कम्प्यूटरों की पंचम पीढ़ी कम्प्यूटरों की पॉचवी पीढ़ी के श्रेणी में वर्तमान और भविश्य के कम्प्यूटरों को रखा गया है। इस पीढी के कम्प्यूटरों के बारे में बहुत अधिक नहीं बताय जा सकता हे क्योंक इसके अंतर्गत भविश्य के कम्प्यूटर अत्याधिक तार्किक हो जायेगें। इस पीढ़ी के कम्प्यूटरों नेटवर्क के विकास की और भी संभावनाएॅ हैं। कई जटिल क्षेत्रों में इस पीढ़ी के कम्प्यूटरों से बहुत आषाएॅ है।
पर्सनल कम्प्यूटर पर्सनल कम्प्यूटर तथा माइक्रो कम्प्यूटर समानार्थक रूप से जाने वाले वैसे कम्प्यूटर प्रणाली हैं जो विषेश रूप से व्यक्तिगत उपयोग अथवा छोटे समूह के द्वारा प्रयोग में लाए जाते है। इन कम्प्यूटरों को बनाने में माइक्रोप्रोसेसर मुख्य रूप से सहायक होते हैं। पर्सनल कम्प्यूटर का निर्माण विषेश क्षेत्र तथा कार्य को ध्यान में रखते हुए किया जाता है। उदाहरणार्थ- घरेलू कम्प्यूटर तथा कार्यालय मे प्रयोग किये जाने वाले कम्प्यूटर। बाजार में, छोटे स्तर की कम्पनियों अपने कार्यालयों के कार्य के लिए पर्सनल कम्प्यूटर को ही प्राथमिता देते है। पर्सनल कम्प्यूटर के मुख्य कार्यो में क्रीड़ा, इन्टरनेट का प्रयोग, सीखना-सिखाना, षब्द-प्रक्रिया इत्यादि षामिल है। पर्सनल कम्प्यूटर के कुछ व्यवसायिक कार्य निम्नलिखित हैं।
- कम्प्यूटर सहाक रूपरेखा तथा निर्माण
- इन्वेन्ट्री तथा प्रोडक्षन कन्ट्रोल
- स्प्रेडषीट कार्य
- अकाउन्टिंग
- सॉप्टवेयर निर्माण
- वेबसाइट डिजाइनिंग तथा निर्माण
- सांख्यिकी गणना
माइक्रोप्रोसेसर का विकास इन्टेल कॉरपोरेषन को सामान्यतः ऐसे कम्पनी होने का गौरव प्राप्त हैं जिसने सबसे पहले माइक्रोप्रोसेसर को बाजार में उपल्बध किया। इसके सबसे पहले माइक्रोंप्रासेसर 4004 का 1971 ई. में बाजार में परिचय हुआ जिसका विकास कैलकुलेटर चिप सेट के निर्माण के दोरान हुआ। 4004 माइक्रोप्रोसेसर उस चिप सेट का केन्द्रीय पुर्जा था, जिसका नाम MCS-4 रखा गया। उस सेट में कुछ और पुर्जो को सम्मलित किया गया था जिनके नाम 4001 रैम, 4002 रैम तथा 4003 षिफ्ट रजिस्टर थे। इसके उपरान्त, तीन अन्य और माइक्रोप्रोसेसरों का विकास हुआ। इनके नाम रॉकवेल अन्तर्राश्ट्रीय चार-बीट PPS-4, इन्टेल का 8-बीट 8008 तथा राश्ट्रीय अर्द्धचालक 16 बीट IMP-16 थे। 1971 तथा 1973 के मध्य में जिन माइक्रोप्रोसेसरों का विकास हुआ उन्हें प्रथम पीढ़ी का प्रोसेसर कहा जा सकता है। वें मेटल अॅाक्साइड सेमीकन्डक्टर प्रौद्योगिकी पर आधारित थे।पर्सनल कम्प्यूटर के प्रकार पर्सनल कम्प्यूटर मुख्य रुप से दो प्रकार के होते हैं- डेस्क टॉप और पोर्टेबल डेस्क टॉप पी. सी. अधिकतर विद्यालयों, घरों और व्यवसायों में उपयोग किए जानें वालें पी. सी. डेस्क टॉप पी. सी. होते है। डेस्क टॉप पी. सी. के बाजार में उपलब्ध माडॅल है- IBM PC, Compaq, Pentium, Pentium II, Pentium III, IV आदि ।
डेस्क टॉप पी. सी. को हम दो भागों में बॅाट सकते है: सिंगल यूजर सिस्टम और मल्टी यूजर सिस्टम।
सिंगल यूजर एक बार में एक व्यक्ति द्वारा उपयोग किया जानें वाला पी. सी. होता है।
मल्टी यूजर वे पी. सी. है जिन्हें अनेक व्यक्ति एक बार में काम में ले सकतें है, ऐसे पा. सी. नेटवर्क पर लगायें जातें है। प्रत्येक व्यक्ति अलग -अलग कम्प्यूटर पर कार्य करता है लेकिन ये सभी कम्प्यूटर परस्पर जुड़ें रहतें है।
पोर्टेबल पी. सी. इसके अन्तर्गत वैसे पर्सनल कम्प्यूटर आतें है जो सुविधाजनक तरीके से एक स्थान से दुसरे स्थान तक स्थानांतरित किए जा सकतें है। पोर्टेबल पी. सी. निम्नलिखित प्रकार के होतें हैः-
लैपटॉप पी. सी.ण्आज व्यवसायिकों, पत्रकारों, व्यापारियों एवं विषेशकर उन लोगो की पहली पसंद है जो प्रायः अपनें पूरे कार्यालय को अपने साथ ही रखना पंसद करतें है। ऐसे पी. सी. जिनका वनज बहुत कम होता है और व्यक्ति उसे अपनी गोद में रखकर कार्य कर सकता है उसे लेपटॉप कहतें है। लेपटॉप की बनावट ऐसी होती है कि उसे ब्रीफकेस की तरह एक स्थान से दुसरे स्थान ले जाया जा सकता है। इनकी स्क्रीन चपटी होती है, की-बोर्ड के बटन छोटे होतें है जो की बहुत कम स्थान घेरते है।
पाम टॉप पी सी हथेली के आकार के पी सी को पॉम टाप पी सी कहते है। छोटा -सा पी सी एक व्यक्ति की कमीज या पेंन्ट की जेब में रखा जा सकता है। आजकल सेल्यूलर फोन में पी सी को समाहित करके इसका उपयोग बहुआयामी कर दिया गया है। यह पामटॉप पी. सी. इलेक्ट्रानिक डायरी के रूप में हमें विभिन्न सूचनाएं एकत्रित करके देता है जैसे -विभिन्न षहरो के मानचित्र ,षेयर बाजार की वर्तमान स्थिति ,टलीफोन डायरेक्ट्री ,विभिन्न टैक्सो की सारणी,होटलों के पते आदि। इस पी.सी. में कैल्कुलेटर के समान छोटे बटनों वाला की’-बोर्ड होता है, एक छोटी सी स्क्रीन होती और इसे बैटरी से चलाया जाता है।
नोटबुक नोटबुक तथा लैपटॉप लगभग एक समान होते है। कंपनियांें में बढ़ते प्रतियोगिता ने भले इसे अलग कर रखा हो। तथा यह आसानी से एक ब्रीफकेस में आ सकता है। आकार तथा सुवाहनीय (probability) के अतिरिक्त एक सामान्य पर्सनल कंम्प्यूटर तथा नोटबुक के मध्य अंतर इसके डिस्प्ले स्क्रीन का होता है। नोटबुक कंम्प्यूटर के डिस्प्ले स्क्रीन में फ्लैट पैनल प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया जाता है जिसके कारण यह हल्का तथा पतला होता है। नोटबुक के डिस्प्ले स्क्रीन काफी भिन्न हाते है। सक्रिय मैट्रिक्स स्क्रीन अत्यंत तीव्र आकृति बनाते है परंतु ये पूर्ण आकार मॉनीटर की भांति तेजी से रिफ्रेष करते है। गणना-षक्ति के मामले में ,नोटबुक कंम्प्यूटर लगभग पर्सनल कंम्प्यूटर के समान होते है। इनमें भी एक ही जैसे सी.पी.यू. मेमारी क्षमता तथा डिस्क ड्राइव होते है। किन्तु छोटे पैकेज में पूरी क्षमता का समाना मंहगा होता है। नोटबुक कंम्प्यूटर बैटरी पैक के साथ आती है जिसकी सहायता से इसको बगैर प्लग किये हुए भी चला सकता है किन्तु, बैटरी को कुछ घंटो के बाद चार्ज करते रहने की आवष्यकता होती है।
कम्प्यूटर संगठन तथा कार्यप्रणाली
परिचय कम्प्यूटर की रचना का सबसे महत्वपूर्ण भाग सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट है जहॉ इनपुट किये गये डाटा पर प्रक्रिया होती है। तदोपरान्त, डाटा सूचना का रूप धारण करता है।
कम्प्यूटर प्रणाली एक या एक से अधिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कार्यरत इकाइयों के समुह को एक प्रणाली कहते हैं। जैसे- अस्पताल एक प्रणाली है, जिसकी विभिन्न इकाइयॉ (भाग) हैं- डॉक्टर, नर्स, चिकित्सा के उपकरण, ऑपरेषन थियेटर, मरीज आदि तथा इसका लक्ष्य है, मरीजों की सेवा व चिकित्सा। उसी प्रकार कम्प्यूटर भी एक सिस्टम के रूप में कार्य करता है जिसके निम्नलिखित भाग या इकाइयॉ हैंः
- कम्प्यूटर हार्डवेयर- कम्प्यूटर के यांत्रिक, विद्युत तथा इलेक्ट्रॉनिक भाग, कम्प्यूटर हार्डवेयर कहलाते हैं। दूसरे परिभाशा में, कम्प्यूटर तंत्र की वह इकाई जिन्हें देखा जा सकता हो तथा स्पर्ष किया जा सकता हो कम्प्यूटर हार्डवेयर कहलाते हैं। जैसे मॉनीटर, की-बोर्ड आदि।
- कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर- ये वे प्रोग्राम हैं, जो कम्प्यूटर को यह निर्देष देते हैं कि किस प्रकार डाटा की प्रोसेसिंग की जाये और आवष्यक सूचना और परिणाम जनित की जाये। दूसरी परिभाशा में, कम्प्यूटर तंत्र की वह इकाई जो कम्प्यूटर हार्डवेयर के संसाधनों का उपयोग करती है, कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर कहलाते हैं, जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम।
- कम्प्यूटर पर्सनेल या प्रयोक्ता- वे लोग जो कम्प्यूटरीकृत डाटा तैयार करते हैं, प्रोग्राम लिखते हैं, कम्प्यूटर को चलाते हैं तथा आउटपुट प्राप्त करते हैं, कम्प्यूटर पर्सनेल या प्रयोक्ता कहलाते हैं।
कम्प्यूटर की रचना कम्प्यूटर मुख्यतः तीन भागो पर आधारित हैः-
1) इनपुट यूनिट 2) आउटपुट यूनिट 3) सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट
1) इनपुट यूनिटरू. डाटा और निर्देष कम्प्यूटर में जिस यूनिट की सहायता से प्रविश्ट किये जाते हैं, यह इनपुट कहलाती है। इनपुट यूनिट डाटा और निर्देषो को बाइनरी (0 और 1) में परिवर्तित करके कम्प्यूटर के समझने योग्य बनाती है। सामान्यतः इनपुट यूनिट में की-बोर्ड प्रयुक्त किया जाता है। इनपुट यूनिट के लिए अन्य निम्नलिखित इनपुट डिवाइसेज भी उपलब्ध रहती है।
(a) माउस (b) जॉयस्टिक (c) ट्रेकबॉल (d) लाइटपेन (e) ग्राफिक टेबलेट (f) टच स्क्रीन (g) स्कैनर (h) OMR, OCR, MICR इत्याइि।
(a) से (c) तक की सभी डिवाइसेज स्क्रीन पर किसी वस्तु को चिह्नित करने के काम आती है। इसलिये इन्हें पॉइंटिग डिवाइसेज कहा जाता है। इनपुट डिवाइसेज के रूप में माइक्रोफोन का भी प्रयोग किया जाता है।
2) आउटपुट यूनिट:- यह ऐसी यूनिट है जो कम्प्यूटर में प्रक्रिया के पष्चात सूचना और परिणाम कम्प्यूटर के बाहरी वातावरण में प्रस्तुत करती है। आउटपुट यूनिट के लिए मुख्य डिवाइस स्क्रीन या मॉनीटर होती है। इसके अलावा अन्य प्रकार की निम्नलिखित आउटपुट डिवाइसेज भी कम्प्यूटर से प्राप्त आउटपुट को हमें प्रस्तुत करती है।
सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट:- सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट कम्प्यूटर का मस्तिश्क होता हैै इसका मूख्य कार्य प्रोग्रामों को क्रियांवित करना है। इसके अलावा सी.पी.यू. कम्प्यूटर के सभी भागों, जैसे- मेमोरी, इनपुट और आउटपुट डिवाइसेज के कार्यो को भी नियंत्रित करता है।प्रोग्राम और डाटा,इसके नियंत्रण में मेमोरी में संग्रहित होते है। इसी के नियंत्रण में आउटपुट स्क्रीन पर दिखाई देता है। या प्रिंटर के द्वारा कागज पर छापता है।
सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट के तीन भाग होते है। ये निम्नलिखित है।
कन्ट्रोल यूनिट यह भाग कम्प्यूटर की आन्तरिक क्रियाओं का संचालन करता है। यह इनपुट/आउटपुट क्रियाओं को नियंत्रित करता है, साथ ही मेमोरी और ए.एल.यू के मध्य डाटा के आदान प्रदान को निर्देषित करता है। यह प्रोग्राम को क्रियांवित करने के लिए प्रोग्राम के निर्देषो को मेमोरी से प्राप्त करता है। निर्देषो को विद्युत-संकेतो में परिवर्तित करके यह उचित डिवाइसेज तक पहॅुचाता है। इन सभी निर्देषो के विद्युत-संकेत सिस्टम बस की नियंत्रक बस के माध्यम से कम्प्यूटर के विभिन्न भागों तक संचरित होते है।
एरिथमेटिक एवम् लॉजिक यूनिट एरिथमेटिक एवम् लॉजिक यूनिट को संक्षेप में ए.एल.यू यूनिट कहते है। यह यूनिट डाटा पर अंकगणितीय क्रियाए (जोड़,बाकी,गुणा,भाग) और तार्किक क्रियाए करती है। इसमे ऐसा इलेक्ट्रॉनिक परिपथ होता है जो बायनरी अंकगणितीय की गणनाए करने में सक्षम होता है। ए एल यू सभी गणनाओं को पहले सरल अंकगणितीय क्रियाओं में बॉट लेता है, जैसे-गुणा को बार-बार जोड़ने कि ंिक्रया में बदलना । बाद में इन्हें विद्युत पल्स में बदल कर परिपथ में आगे संचारित किया जाता है। तार्किक क्रियाए में ए एल यू दो संख्याओ या डाटा की तुलना करता है और प्रक्रिया में निर्णय लेने का कार्य करता है। ए.एल.यू कंट्रोल यूनिट से निर्देष लेता है। यह मेमोरी से डाटा प्राप्त करता है और मेमोरी से ही सूचना को लौटा देता है। यह लगभग 1000000 गणनाएँ प्रति सैकण्ड की गति से कार्य करता है। इनमें कई रजिस्टर और एक्यमुलेटर होते है जो गणनाओं के दौरान क्षणिक संग्रह हेतु क्षणिक मेमोरी का कार्य करता है।
उदाहरणार्थ, माना दो संख्याओं A और B को जोड़ना है। कंट्रोल यूनिट A को मेमोरी से चुनकर ए.एल.यू. में स्थित B में जोड़ती है। परिणाम मेमोरी में स्थ्ति हो जाता है या आगे गणना हेतु एक्युमुलेटर में संगृहीत रह जाता है।

कम्प्यूटर का ब्लाक चित्र
रजिस्टर कम्प्यूटर निर्देष सी.पी.यू. के द्वारा क्रियान्वित किए जाते हैं। निर्देषों को क्रियान्वित करने के लिए सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है। सूचनाओं को संतोशजनक व तेजी से आदान-प्रदान के लिए कम्प्यूटर का सी.पी.यू मेमोरी यूनिट का प्रयोग करता है। इन मेमोरी यूनिट को रजिस्टर कहते है। रजिस्टर में सूचनाए अस्थायी रूप से संगृहित होते है। किसी भी रजिस्टर का आकार उसका बिट संगृहित करने की क्षमता के बराबर होता है। रजिस्टर जितने अधिक बिट की होगी उतनी ही अधिक तेजी से कंम्प्यूटर में डाटा प्रोसेसिग का कार्य संम्पन्न होगा। कम्प्यूटर में प्रायः निम्न प्रकार के रजिस्टर होते हैं।
- मेमारी एड्रेस रजिस्टर-यह कंम्प्यूटर निर्देष की सक्रिय मेमोरी स्थान संगृहित रखता है।
- मेमोरी बफर रजिस्टरः-यह रजिस्टर मेमोरी से पढ़े गये या लिखे गए किसी षब्द के तथ्यों को संगृहित रखता है।
- प्रोग्राम कंट्रोल रजिस्टर:- यह रजिस्टर क्रियान्वित होने वाली अगले निर्देष का पता संगृहित रखता है।
- एक्यूमुलेटर रजिस्टर:- यह रजिस्टर क्रियान्वित होते हुए डाटा रजिस्टर को, उसके आरंभिक रिजल्ट व अन्तिम रिजल्ट को संगृहित रखता है। प्रायः ये रजिस्टर सूचनाओं के क्रियान्वयन के समय प्रयोग होता है।
- इन्स्ट्रक्षन रजिस्टर:-यह रजिस्टर क्रियान्वित होने वाली सूचना को संगृहित रखता है।
- इनपुट/आउटपुट रजिस्टर:- ये रजिस्टर विभिन्न इनपुट /आउटपुट डिवाइस के मध्य सूचनाओं का आवागमन के लिए प्रयोग होता है।
इन्सट्रक्षन सेट- सी.पी.यू. के निर्देष, जो कमाण्डस को क्रियान्वित करने हेतु है, कंट्रोल यूनिट में तैयार किये जाते है। निर्देष समूह वैसे सभी क्रियाओं की सूची तैयार करता है जो सी.पी.यू. कर सकता है। इन्सट्रक्षन सेट का प्रत्येक निर्देष माइक्रोकोड में व्यक्त किये जाते है जो कि बुनियादी निर्देषों को सी पी यू को यह बताता है कि जटिल क्रियाओ को कैसे क्रियान्वित करे।
प्रोसेसर स्पीड मेमोरी मेमोरी कम्प्यूटर की विभिन्न प्रतिभाओ में एक है। यह इस प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है यह कम्प्यूटर में प्रविश्ट किये डाटा एंव निर्देषों को स्थायी एंव अस्थायी रुप से सुरक्षित रखता है। यह दो प्रकार के होते
प्रारम्भिक मेमोरी- इसे प्राइमरी स्टोरेज डिवाइस कहा जाता है एंव यह कम्प्यूटर के सी.पी.यू. से सीधा जुड़ा रहता है।
द्वितीयक मेमोरी- यह सी.पी.यू का आंतरिक एंव बाह् भाग होता है।
एक कम्प्यूटर सिस्टम प्रभावषाली रुप से तभी कार्य कर सकता है जबकि इसके तीनो भाग सुचारू रूप से क्रियाषील हो । किसी भी एक भाग के क्रियाषील न होने की दषा में सम्पूर्ण कम्प्यूटर कार्य नही कर सकेगा।
मेमोरी कम्प्यूटर का कार्यकारी संग्रहण है। यह कम्प्यूटर का एक महत्वपूर्ण भाग हैं जहॉ डाटा, सूचना और प्रोग्राम प्रक्रिया के दौरान स्थित रहते हैं और आवष्यकता पड़ने पर तत्काल प्राप्त होते है। मेमोरी को प्राथमिक मेमोरी या मुख्य मेमोरी भी कहते हैं। मेमोरी में संग्रहण के लिये अनेक स्थान होते हैं जिनकी संख्या निष्चित होती है। यह मेमोरी की क्षमता य मेमोरी का आकार कहलाता है। मेंमोरी की क्षमता मापने वाले इकाई को बाइट कहते हैं। यदि एक सामान्य पर्सनल कम्प्यूटर की मेमोरी 1 एम. बी. है तो इसका अर्थ है कि यह लगभग 1048576 अक्षरों को संगृहीत कर सकता है।
कम्प्यूटर की मुख्य मेमोरी दो प्रकार की होती है:-
- रैम या रैन्डम एक्सेस मेमोरी
- रोम रीड ऑनली मेमोरी
रैन्डम एक्सेस मेमोरी रैम या रैन्डम एक्सेस मेमोरी कम्प्यूटर की अस्थाई मेमोरी होती हैं। की-बोर्ड या अन्य किसी अनपुट डिवाइस से इनपुट किया गया डाटा, प्रक्रिया से पहले रैम में ही संगृहीत किया जाता है और सी. पी. यू. द्वारा आवष्चकतानुसार वहॉ से प्राप्त किया जाता है। रैम में डाटा या प्रोग्राम अस्थाई रूप से संगृहीत रहतें है। कम्प्यूटर बन्द हो जाने या विद्युत बाधित हो जाने पर रैम में संगृहीत डाटा मिट जाता है। इसलिए रैम को वोलेटाइल या अस्थाई मेमोरी भी कहते है। रैम की क्षमता या आकर विभिन्न प्रकार के होते है। जैसे- 16 MB, 32 MB, 64 MB, 128 MB, 256 MB आदि। पर्सनल कम्प्यूटर में कई प्रकार के रैम प्रयुक्त किए जाते है:-
- डायनैमिक रैम
- सिन्क्रोनस डीरैम
- स्टैटिक रैम
डायनैमिक रैम:-डायनैमिक रैम को संक्षिप्त रूप में डीरैम से जाना जाता हैं। डीरैम रैम में सबसे अधिक साधारण है तथा इसे जल्दी-जल्दी रिफ्रेष करने की आवष्यकता पड़ती है। रिफ्रेष का अर्थ यहॉ पर चिप को विद्युत आवेषित करना होता है। यह एक सेकण्ड में लगभग हजारों बार रिफ्रेष होता है तथा प्रत्येक बार रिफ्रेष होने के उपरान्त यह पहले के विशय-वस्तु को मिटा देता हैं। इसके जल्दी-जल्दी रिफ्रंेष होने के लक्षण के फलस्वरूप यह दूसरे रैम की अपेक्षा मन्द गति का है।
सिन्क्रोनस डीरैम:- इस प्रकार का चीप सामान्य डीरैम की अपेक्षा ज्यादा तेज है। इसके तेज गति का कारण यह है कि यह सी. पी. यू. के धड़ी के अनुसार चलता है तथा इसके कारण यह दूसरे डीरैम की अपेक्षा डाटा को तेजी से स्थानांतरित कराता है।
स्टैटिक रैम:- स्टैटिक रैम कम रिफ्रेष होता है फलस्वरूप यह डाटा को अनेक्षाकृत अधिक समय तक रखता है। सभी प्रकार के रैम की अपेक्षा एस-रैम अधिक तेज तथा महॅगा होता है। इनका प्रयोग विषिश्ट उद्देषीय कम्प्यूटरों के लिए किया जाता है।
रीड ऑनली मेमोरी:-रोम का पूरा नाम रीड ऑनली मेमोरी होता है। यह स्थाई मेमोरी होती है जिसमें कम्प्यूटर के निर्माण के समय प्रोग्राम संगृहीत कर दिये जाते है। इस मेमोरी में संगृहीत प्रोग्राम परिवर्तित और नश्ट नहीं किये जा सकते है, उन्हें केवल पढ़ा जा सकता है। इसलिए यह मेमोरी, रीड ऑनली मेमोरी कहलाती है। कम्प्यूटर का स्विच ऑफ करने के बाद भी रोम में संगृहीत अवयव नश्ट नहीं होते है। अतः रोम नॉन-वोलेटाइल या स्थाई संग्रह माध्यम कहलाता है। इसमें कम्प्यूटर की बनावट के अनुसार प्रोग्राम या सॉप्टवेयर संगृहीत रहते हैं।
रोम के विभिन्न प्रकार होते हैं जो निम्नलिखित हैंः-
प्रोग्रामैबल रीड ऑनली मेमोरी:- प्रोग्राम में ऐसा रिक्त रोम होता है जिसमें आवष्यकता होने पर विषेश उपकरणों द्वारा प्रोग्राम संगृहीत किये जा सकते हैं और एक बार संगृहीत होने के बाद इन्हें मिटाया नहीं जा सकता।
इरेजेबल प्रोग्रामैबल रीड ऑनली मेमोरी यह प्रोग्रामैबल रीड ऑनली मेमोरी के समान ही होती है, लेकिन इसमें संगृहीत पराबैगनी प्रकाष की पस्थिति में मिटाये जा सकते हैं और नये प्रोग्राम संगृहीत किये जा सकते हैं।
एक नई तकनीक इ-इप्रोम भी है। जिसमें प्रोग्राम को मेमोरी को मेमोरी से विद्युतीय विधि से मिटायी जा सकती है। इसका पूर्ण रूप इलेक्ट्रिकल इरेजेबल प्रोग्रामैबल रीड ऑनली मेमोरी कहलाती है।
कैष मेमोरी कैष मेमोरी उच्च गति वाली मेमोरी होती है जो कम्प्यूटर में सी. पी. यू. तथा रैम के मध्य स्थित होती है। सी.पी.यू. डाटा या निर्देष को रैम तथा डिस्क के अनेक्षाकृत कैष मेमोरी से अधिक षीघ्रता के साथ प्राप्त कर सकती है। इन दिनों कम्प्यूटर में 256, 512 तथा 1024 KB कैष मेमोरी उपलब्ध होती हैं।
- इनपुट डिवाईस का परिचय इनपुट डिवाइसेज डाटा और सूचना को कम्प्यूटर के समझने योग्य संकेतों (1 और 0 के Bit ) में परिवर्तित करके कम्प्यूटर में इनपुट करते हैं। आज विभिन्न प्रकार की इनपुट डिवाइसेज बाजार में उपलब्ध हैं। इन डिवाइसेज को दो श्रेणियों में बॉटा जा सकता है-ऑन लाइन इनपुट डिवाइसेज वे उपकरण हैं जो कम्प्यूटर से सीधे सम्पर्क में रहते हैं। ये डिवाइसेज कम्प्यूटर के साथ सक्रिय होकर इनपुट का कार्य सम्पन्न करते हैं।
- ऑफ लाइन इनपुट डिवाइसेज वे उपकरण हैं जो कम्प्यूटर से सीधे सम्पर्क में नहीं रहते हैं और स्वयं से अपने नियंत्रण में कार्य करते हैं।
कम्प्यूटर की रचना कम्प्यूटर मुख्यतः तीन भागो पर आधारित हैः-
1) इनपुट यूनिट 2) आउटपुट यूनिट 3) सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट
1) इनपुट यूनिटरू. डाटा और निर्देष कम्प्यूटर में जिस यूनिट की सहायता से प्रविश्ट किये जाते हैं, यह इनपुट कहलाती है। इनपुट यूनिट डाटा और निर्देषो को बाइनरी (0 और 1) में परिवर्तित करके कम्प्यूटर के समझने योग्य बनाती है। सामान्यतः इनपुट यूनिट में की-बोर्ड प्रयुक्त किया जाता है। इनपुट यूनिट के लिए अन्य निम्नलिखित इनपुट डिवाइसेज भी उपलब्ध रहती है।
(a) माउस (b) जॉयस्टिक (c) ट्रेकबॉल (d) लाइटपेन (e) ग्राफिक टेबलेट (f) टच स्क्रीन (g) स्कैनर (h) OMR, OCR, MICR इत्याइि।
(a) से (c) तक की सभी डिवाइसेज स्क्रीन पर किसी वस्तु को चिह्नित करने के काम आती है। इसलिये इन्हें पॉइंटिग डिवाइसेज कहा जाता है। इनपुट डिवाइसेज के रूप में माइक्रोफोन का भी प्रयोग किया जाता है।
2) आउटपुट यूनिट:- यह ऐसी यूनिट है जो कम्प्यूटर में प्रक्रिया के पष्चात सूचना और परिणाम कम्प्यूटर के बाहरी वातावरण में प्रस्तुत करती है। आउटपुट यूनिट के लिए मुख्य डिवाइस स्क्रीन या मॉनीटर होती है। इसके अलावा अन्य प्रकार की निम्नलिखित आउटपुट डिवाइसेज भी कम्प्यूटर से प्राप्त आउटपुट को हमें प्रस्तुत करती है।
सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट:- सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट कम्प्यूटर का मस्तिश्क होता हैै इसका मूख्य कार्य प्रोग्रामों को क्रियांवित करना है। इसके अलावा सी.पी.यू. कम्प्यूटर के सभी भागों, जैसे- मेमोरी, इनपुट और आउटपुट डिवाइसेज के कार्यो को भी नियंत्रित करता है।प्रोग्राम और डाटा,इसके नियंत्रण में मेमोरी में संग्रहित होते है। इसी के नियंत्रण में आउटपुट स्क्रीन पर दिखाई देता है। या प्रिंटर के द्वारा कागज पर छापता है।
सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट के तीन भाग होते है। ये निम्नलिखित है।
कन्ट्रोल यूनिट यह भाग कम्प्यूटर की आन्तरिक क्रियाओं का संचालन करता है। यह इनपुट/आउटपुट क्रियाओं को नियंत्रित करता है, साथ ही मेमोरी और ए.एल.यू के मध्य डाटा के आदान प्रदान को निर्देषित करता है। यह प्रोग्राम को क्रियांवित करने के लिए प्रोग्राम के निर्देषो को मेमोरी से प्राप्त करता है। निर्देषो को विद्युत-संकेतो में परिवर्तित करके यह उचित डिवाइसेज तक पहॅुचाता है। इन सभी निर्देषो के विद्युत-संकेत सिस्टम बस की नियंत्रक बस के माध्यम से कम्प्यूटर के विभिन्न भागों तक संचरित होते है।
एरिथमेटिक एवम् लॉजिक यूनिट एरिथमेटिक एवम् लॉजिक यूनिट को संक्षेप में ए.एल.यू यूनिट कहते है। यह यूनिट डाटा पर अंकगणितीय क्रियाए (जोड़,बाकी,गुणा,भाग) और तार्किक क्रियाए करती है। इसमे ऐसा इलेक्ट्रॉनिक परिपथ होता है जो बायनरी अंकगणितीय की गणनाए करने में सक्षम होता है। ए एल यू सभी गणनाओं को पहले सरल अंकगणितीय क्रियाओं में बॉट लेता है, जैसे-गुणा को बार-बार जोड़ने कि ंिक्रया में बदलना । बाद में इन्हें विद्युत पल्स में बदल कर परिपथ में आगे संचारित किया जाता है। तार्किक क्रियाए में ए एल यू दो संख्याओ या डाटा की तुलना करता है और प्रक्रिया में निर्णय लेने का कार्य करता है। ए.एल.यू कंट्रोल यूनिट से निर्देष लेता है। यह मेमोरी से डाटा प्राप्त करता है और मेमोरी से ही सूचना को लौटा देता है। यह लगभग 1000000 गणनाएँ प्रति सैकण्ड की गति से कार्य करता है। इनमें कई रजिस्टर और एक्यमुलेटर होते है जो गणनाओं के दौरान क्षणिक संग्रह हेतु क्षणिक मेमोरी का कार्य करता है।
उदाहरणार्थ, माना दो संख्याओं A और B को जोड़ना है। कंट्रोल यूनिट A को मेमोरी से चुनकर ए.एल.यू. में स्थित B में जोड़ती है। परिणाम मेमोरी में स्थ्ति हो जाता है या आगे गणना हेतु एक्युमुलेटर में संगृहीत रह जाता है।

कम्प्यूटर का ब्लाक चित्र
रजिस्टर कम्प्यूटर निर्देष सी.पी.यू. के द्वारा क्रियान्वित किए जाते हैं। निर्देषों को क्रियान्वित करने के लिए सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है। सूचनाओं को संतोशजनक व तेजी से आदान-प्रदान के लिए कम्प्यूटर का सी.पी.यू मेमोरी यूनिट का प्रयोग करता है। इन मेमोरी यूनिट को रजिस्टर कहते है। रजिस्टर में सूचनाए अस्थायी रूप से संगृहित होते है। किसी भी रजिस्टर का आकार उसका बिट संगृहित करने की क्षमता के बराबर होता है। रजिस्टर जितने अधिक बिट की होगी उतनी ही अधिक तेजी से कंम्प्यूटर में डाटा प्रोसेसिग का कार्य संम्पन्न होगा। कम्प्यूटर में प्रायः निम्न प्रकार के रजिस्टर होते हैं।
- मेमारी एड्रेस रजिस्टर-यह कंम्प्यूटर निर्देष की सक्रिय मेमोरी स्थान संगृहित रखता है।
- मेमोरी बफर रजिस्टरः-यह रजिस्टर मेमोरी से पढ़े गये या लिखे गए किसी षब्द के तथ्यों को संगृहित रखता है।
- प्रोग्राम कंट्रोल रजिस्टर:- यह रजिस्टर क्रियान्वित होने वाली अगले निर्देष का पता संगृहित रखता है।
- एक्यूमुलेटर रजिस्टर:- यह रजिस्टर क्रियान्वित होते हुए डाटा रजिस्टर को, उसके आरंभिक रिजल्ट व अन्तिम रिजल्ट को संगृहित रखता है। प्रायः ये रजिस्टर सूचनाओं के क्रियान्वयन के समय प्रयोग होता है।
- इन्स्ट्रक्षन रजिस्टर:-यह रजिस्टर क्रियान्वित होने वाली सूचना को संगृहित रखता है।
- इनपुट/आउटपुट रजिस्टर:- ये रजिस्टर विभिन्न इनपुट /आउटपुट डिवाइस के मध्य सूचनाओं का आवागमन के लिए प्रयोग होता है।
इन्सट्रक्षन सेट- सी.पी.यू. के निर्देष, जो कमाण्डस को क्रियान्वित करने हेतु है, कंट्रोल यूनिट में तैयार किये जाते है। निर्देष समूह वैसे सभी क्रियाओं की सूची तैयार करता है जो सी.पी.यू. कर सकता है। इन्सट्रक्षन सेट का प्रत्येक निर्देष माइक्रोकोड में व्यक्त किये जाते है जो कि बुनियादी निर्देषों को सी पी यू को यह बताता है कि जटिल क्रियाओ को कैसे क्रियान्वित करे।
प्रोसेसर स्पीड मेमोरी मेमोरी कम्प्यूटर की विभिन्न प्रतिभाओ में एक है। यह इस प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है यह कम्प्यूटर में प्रविश्ट किये डाटा एंव निर्देषों को स्थायी एंव अस्थायी रुप से सुरक्षित रखता है। यह दो प्रकार के होते
प्रारम्भिक मेमोरी- इसे प्राइमरी स्टोरेज डिवाइस कहा जाता है एंव यह कम्प्यूटर के सी.पी.यू. से सीधा जुड़ा रहता है।
द्वितीयक मेमोरी- यह सी.पी.यू का आंतरिक एंव बाह् भाग होता है।
एक कम्प्यूटर सिस्टम प्रभावषाली रुप से तभी कार्य कर सकता है जबकि इसके तीनो भाग सुचारू रूप से क्रियाषील हो । किसी भी एक भाग के क्रियाषील न होने की दषा में सम्पूर्ण कम्प्यूटर कार्य नही कर सकेगा।
मेमोरी कम्प्यूटर का कार्यकारी संग्रहण है। यह कम्प्यूटर का एक महत्वपूर्ण भाग हैं जहॉ डाटा, सूचना और प्रोग्राम प्रक्रिया के दौरान स्थित रहते हैं और आवष्यकता पड़ने पर तत्काल प्राप्त होते है। मेमोरी को प्राथमिक मेमोरी या मुख्य मेमोरी भी कहते हैं। मेमोरी में संग्रहण के लिये अनेक स्थान होते हैं जिनकी संख्या निष्चित होती है। यह मेमोरी की क्षमता य मेमोरी का आकार कहलाता है। मेंमोरी की क्षमता मापने वाले इकाई को बाइट कहते हैं। यदि एक सामान्य पर्सनल कम्प्यूटर की मेमोरी 1 एम. बी. है तो इसका अर्थ है कि यह लगभग 1048576 अक्षरों को संगृहीत कर सकता है।
कम्प्यूटर की मुख्य मेमोरी दो प्रकार की होती है:-
- रैम या रैन्डम एक्सेस मेमोरी
- रोम रीड ऑनली मेमोरी
रैन्डम एक्सेस मेमोरी रैम या रैन्डम एक्सेस मेमोरी कम्प्यूटर की अस्थाई मेमोरी होती हैं। की-बोर्ड या अन्य किसी अनपुट डिवाइस से इनपुट किया गया डाटा, प्रक्रिया से पहले रैम में ही संगृहीत किया जाता है और सी. पी. यू. द्वारा आवष्चकतानुसार वहॉ से प्राप्त किया जाता है। रैम में डाटा या प्रोग्राम अस्थाई रूप से संगृहीत रहतें है। कम्प्यूटर बन्द हो जाने या विद्युत बाधित हो जाने पर रैम में संगृहीत डाटा मिट जाता है। इसलिए रैम को वोलेटाइल या अस्थाई मेमोरी भी कहते है। रैम की क्षमता या आकर विभिन्न प्रकार के होते है। जैसे- 16 MB, 32 MB, 64 MB, 128 MB, 256 MB आदि। पर्सनल कम्प्यूटर में कई प्रकार के रैम प्रयुक्त किए जाते है:-
- डायनैमिक रैम
- सिन्क्रोनस डीरैम
- स्टैटिक रैम
डायनैमिक रैम:-डायनैमिक रैम को संक्षिप्त रूप में डीरैम से जाना जाता हैं। डीरैम रैम में सबसे अधिक साधारण है तथा इसे जल्दी-जल्दी रिफ्रेष करने की आवष्यकता पड़ती है। रिफ्रेष का अर्थ यहॉ पर चिप को विद्युत आवेषित करना होता है। यह एक सेकण्ड में लगभग हजारों बार रिफ्रेष होता है तथा प्रत्येक बार रिफ्रेष होने के उपरान्त यह पहले के विशय-वस्तु को मिटा देता हैं। इसके जल्दी-जल्दी रिफ्रंेष होने के लक्षण के फलस्वरूप यह दूसरे रैम की अपेक्षा मन्द गति का है।
सिन्क्रोनस डीरैम:- इस प्रकार का चीप सामान्य डीरैम की अपेक्षा ज्यादा तेज है। इसके तेज गति का कारण यह है कि यह सी. पी. यू. के धड़ी के अनुसार चलता है तथा इसके कारण यह दूसरे डीरैम की अपेक्षा डाटा को तेजी से स्थानांतरित कराता है।
स्टैटिक रैम:- स्टैटिक रैम कम रिफ्रेष होता है फलस्वरूप यह डाटा को अनेक्षाकृत अधिक समय तक रखता है। सभी प्रकार के रैम की अपेक्षा एस-रैम अधिक तेज तथा महॅगा होता है। इनका प्रयोग विषिश्ट उद्देषीय कम्प्यूटरों के लिए किया जाता है।
रीड ऑनली मेमोरी:-रोम का पूरा नाम रीड ऑनली मेमोरी होता है। यह स्थाई मेमोरी होती है जिसमें कम्प्यूटर के निर्माण के समय प्रोग्राम संगृहीत कर दिये जाते है। इस मेमोरी में संगृहीत प्रोग्राम परिवर्तित और नश्ट नहीं किये जा सकते है, उन्हें केवल पढ़ा जा सकता है। इसलिए यह मेमोरी, रीड ऑनली मेमोरी कहलाती है। कम्प्यूटर का स्विच ऑफ करने के बाद भी रोम में संगृहीत अवयव नश्ट नहीं होते है। अतः रोम नॉन-वोलेटाइल या स्थाई संग्रह माध्यम कहलाता है। इसमें कम्प्यूटर की बनावट के अनुसार प्रोग्राम या सॉप्टवेयर संगृहीत रहते हैं।
रोम के विभिन्न प्रकार होते हैं जो निम्नलिखित हैंः-
प्रोग्रामैबल रीड ऑनली मेमोरी:- प्रोग्राम में ऐसा रिक्त रोम होता है जिसमें आवष्यकता होने पर विषेश उपकरणों द्वारा प्रोग्राम संगृहीत किये जा सकते हैं और एक बार संगृहीत होने के बाद इन्हें मिटाया नहीं जा सकता।
इरेजेबल प्रोग्रामैबल रीड ऑनली मेमोरी यह प्रोग्रामैबल रीड ऑनली मेमोरी के समान ही होती है, लेकिन इसमें संगृहीत पराबैगनी प्रकाष की पस्थिति में मिटाये जा सकते हैं और नये प्रोग्राम संगृहीत किये जा सकते हैं।
एक नई तकनीक इ-इप्रोम भी है। जिसमें प्रोग्राम को मेमोरी को मेमोरी से विद्युतीय विधि से मिटायी जा सकती है। इसका पूर्ण रूप इलेक्ट्रिकल इरेजेबल प्रोग्रामैबल रीड ऑनली मेमोरी कहलाती है।
कैष मेमोरी कैष मेमोरी उच्च गति वाली मेमोरी होती है जो कम्प्यूटर में सी. पी. यू. तथा रैम के मध्य स्थित होती है। सी.पी.यू. डाटा या निर्देष को रैम तथा डिस्क के अनेक्षाकृत कैष मेमोरी से अधिक षीघ्रता के साथ प्राप्त कर सकती है। इन दिनों कम्प्यूटर में 256, 512 तथा 1024 KB कैष मेमोरी उपलब्ध होती हैं।
- इनपुट डिवाईस का परिचय इनपुट डिवाइसेज डाटा और सूचना को कम्प्यूटर के समझने योग्य संकेतों (1 और 0 के Bit ) में परिवर्तित करके कम्प्यूटर में इनपुट करते हैं। आज विभिन्न प्रकार की इनपुट डिवाइसेज बाजार में उपलब्ध हैं। इन डिवाइसेज को दो श्रेणियों में बॉटा जा सकता है-ऑन लाइन इनपुट डिवाइसेज वे उपकरण हैं जो कम्प्यूटर से सीधे सम्पर्क में रहते हैं। ये डिवाइसेज कम्प्यूटर के साथ सक्रिय होकर इनपुट का कार्य सम्पन्न करते हैं।
- ऑफ लाइन इनपुट डिवाइसेज वे उपकरण हैं जो कम्प्यूटर से सीधे सम्पर्क में नहीं रहते हैं और स्वयं से अपने नियंत्रण में कार्य करते हैं।
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